Wednesday, September 10, 2008

क्यों ना कुछ अपने बारे मैं

आज मेरे एक साथी ने मुझसे कहा बहुत लिखते हो दूसरो के बारे में कभी अपने बारे में भी लिखो तो जाने बड़े बनते हो ईमानदार। बस मैंने ठान लिया अब तो लिखना है अपने बारे में , वैसे अपने बारे में सही -सही लिखना मुश्किल है , प्रयास करने में कोई हर्ज नही । विस्मिल्ला करता हूँ ।
जब मैं लिखना बैठा तो मुझे अपनी ज़िन्दगी के बिताये हर वो पल याद आ गए जो रोकर या हंसकर गुजारे। नानी की हथेलियों का खुरखुरापन भी याद आया जब वो लाड़ से चहेरे पर फेरती थी , अब वो नही रही । ऐसा ही कुछ मेंरे बाबा की बातें है जो बस यादें ही रह गई है । कहते है न की परिवर्तन का नाम ही जीवन है ।
बाकी मेरे घर में वो सब कुछ है जिससे हम लोग खुश रह लेते है ।
सबसे पहले मैं यह बताना चाहता हूँ की मैं ख़ुद को कैसे देखता हूँ और मैं कौन हूँ । जब भीषण गर्मी के बाद तपती धरती और तपते आसमान में काली घटाए हवायों के साथ उमड़ती चली आती है । मैं उन उमड़ती काली घटायों की बारिश की वह पहली बूँद हूँ जो कहती है की अब मुझसेअब नही रहा जाता कुछ कर गुजरने की छटपटाहट है चाहें मंजिल पाऊ या फ़िर रास्ते की गर्मी से बीच में ही सूख जाऊं ----।
वैसे तो जीवन में ऐसा कुछ भी नही किया है जो लिखा या बताये जाने को हो अभी तो बहुत कुछ करना बाकी है । जिसमे अपने बडों के आशिर्बाद के साथ -साथ साथियों के साथ भी तो जरुरी होगा ।
चाँद चाहे कितनी भी कोशिश कर क्यों न कर ले ,वह रात को दिन नही बना सकता । ऐसा ही कुछ तो होता है साथियों के बिना कोई कार्य करना। मेरा तो किसी काम को करने के लिए पहले कदम को आगे करने में विश्वास है , क्योंकि कदम आगे करने पर रास्ता ख़ुद बा ख़ुद निकल आता है । ऐसा मेरा मानना है । मेरे अब तक के जीवन की दो इच्छाए रही है। पहली ,बेह्तर इंसान बनना । दूसरी ,पूरी तरह खुश रह कर अपने आस पास के लोगो को खुश रखना । प्रभु के आशिर्बाद से कुछ हद तक मैं अपने को सफल भी मानता हूँ ।
मैं अत्यन्त सादा और साधारण इंसान हूँ जो अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रेरणा से कार्य कर रहा हूँ ।
रही बात चेहरे -मोहरे की वो कोई ख़ास नही है । प्रभु ने जान - बूझ कर अच्छा चेहरा मोहरा नही दिया । वैसे मैं कभी -कभी अपने प्रभु से कह लेता हूँ की अरे प्रभु थोड़ा सा अच्छा चेहरा -मोहरा दे दिया होता तो क्या चला जाता ,कुछ हम भी इतरा लेते । हमारा भी तो मन है की कोई हमे अपनेपन का एहसास कराए , हमारी भी तारीफ करे । क्या सारे अपनेपन का ठेका अच्छे चेहरे - मोहरे वालो का है । खैर जाने दीजिये अब इन बातो मैं क्या रखा है ,जो हो गया उसे बदला तो नही जा सकता है । कुल मिला कर मैं बहुत खुश हूँ ,रचनात्मकता मैं विश्वास रखता हूँ क्योंकि जिंदगी बहुत छोटी है अगर हम लोग हर पल अपने चारो ओर नही देखेगे तो कुछ ना कुछ नज़ारा छुट जाएगा । ईश्वर हर पल मेरे साथ है ऐसा मेरा विश्वास है । ईश्वर ने मेरे हर ख्वाब को हकीकत में बदला , लेखन भी उनमे से एक है । ईश्वर का आशिर्बाद ही तो है की मुझ जैसे नालायक को अलौकिक चमत्कार का एहसास कराया । बाकि ईश्वर पर छोड़ दिया है की वो कब तक अलौकिक चमत्कार का एहसास बनाये रखता है बाकि उसकी मर्जी । मैंने अपनी बातचीत में बारिश , गर्मी का जिक्र किया जब बात पूरी कर रहा हूँ तो बरसात का मौसम हो गया है तो उसका असर लेखन पर आ गया है उसके लिए माफ़ कर दे क्योंकि जवान लेखनी से गलती हो जाया करती है । अपने बारे मैं लिखना वाकई मैं काफ़ी मुश्किल है मुझे आज पता चल गया की लोग क्यों अपने बारे में लिखने से बचते है वैसे मैं भी कम नही हूँ मैंने भी कुछ अपनी बातें छुपा ली है अभी मुझे घर मैं रहना है, इतना तो मुझे बेईमान रहना का अधिकार है ।
बस सिर्फ़ अपने अलौकिक चमत्कार के लिए ...............
'फ़िर सावन रुत की पवन चली तुम याद आए ,
फ़िर पत्तो की पायजेब बजी तुम याद आए । { जनाब नासिर काजिम }

8 comments:

Shastri said...

हिन्दी चिट्ठाजगत में इस नये चिट्ठे का एवं चिट्ठाकार का हार्दिक स्वागत है.

मेरी कामना है कि यह नया कदम जो आपने उठाया है वह एक बहुत दीर्घ, सफल, एवं आसमान को छूने वाली यात्रा निकले. यह भी मेरी कामना है कि आपके चिट्ठे द्वारा बहुत लोगों को प्रोत्साहन एवं प्रेरणा मिल सके.

हिन्दी चिट्ठाजगत एक स्नेही परिवार है एवं आपको चिट्ठाकारी में किसी भी तरह की मदद की जरूरत पडे तो बहुत से लोग आपकी मदद के लिये तत्पर मिलेंगे.

शुभाशिष !

-- शास्त्री (www.Sarathi.info)

Shastri said...

एक अनुरोध -- कृपया वर्ड-वेरिफिकेशन का झंझट हटा दें. इससे आप जितना सोचते हैं उतना फायदा नहीं होता है, बल्कि समर्पित पाठकों/टिप्पणीकारों को अनावश्यक परेशानी होती है. हिन्दी के वरिष्ठ चिट्ठाकारों में कोई भी वर्ड वेरिफिकेशन का प्रयोग नहीं करता है, जो इस बात का सूचक है कि यह एक जरूरी बात नहीं है.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

आप बिस्मिल्ला करें या श्रीगणेश, लेकिन इसे आगे जारी भी रखें। यही हमारी दुआ है, और शुभकामना भी।

Udan Tashtari said...

हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है. नियमित लेखन के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाऐं.

वर्ड वेरिपिकेशन हटा लें तो टिप्पणी करने में सुविधा होगी. बस एक निवेदन है.


डेश बोर्ड से सेटिंग में जायें फिर सेटिंग से कमेंट में और सबसे नीचे- शो वर्ड वेरीफिकेशन में ’नहीं’ चुन लें, बस!!!

अनूप शुक्ल said...

सही है। लगे रहो!

प्रदीप मानोरिया said...

बहुत बढिया और सटीक लेखन ब्लोग जगत में आपका स्वागत है निरंतरता की चाहत है
फुर्सत हो तो मेरे ब्लॉग पर भी दस्तक दें

राजेंद्र माहेश्वरी said...

मैं कौन हूं ? जो स्वयं से इस सवाल को नहीं पूंछता है, ज्ञान के द्वार उसके लिए बन्द ही रह जाते है। उस द्वार को खोलने की चाबी यहीं हैं कि स्वयं से पूछो, `` मैं कौन हंू ? ´´ और जो तीव्रता से, समग्रता से अपने से यह सवाल पूछता हैं, वह स्वयं ही उत्तर भी पा जाता है।

Anonymous said...

vishram chand ki sheetalta me hi milta hai,jo aap me hai(AAP MANTE HAIN).yah utkrast sondarya hai.sharad